poached egg plantसुनो वसंत ”

पतझड़ से बहुत डरती हूँ मैं

नही चाहती कभी

पतझड़ देखना

चाहती हूँ तुम छा जाओ

मेरे चारो ओर

फ़ैल जाओ मन की जमी पर

जिद्दी दूब की तरह ”

चाहती हूँ मन को जकड़ लें

इन लाल पीले फूलों वाली जिद्दी लताएँ””

मेरे आस पास यूँ ही

लटकते रहे ये फूलों के गुच्छे”

हर फूल पर बैठी हो रंगीली तितलियाँ””

मन का आँगन लबालब रहे वासंती सुगंध से””

मैं फिर सजाऊँ बालों को फूलों से

बचपन की तरह

आँखे बंद कर गुनगुनाऊ

वो प्यारा सा गीत…..

और फिर से उलझ जाएँ

मेरे बालों में

कुछ नन्ही तितलियाँ

 

….मीनाक्षी वशिष्ठ”

What is this wet stuff falling out of the sky?

Tootlepedal's Blog

Today’s guest picture was taken by my sister Susan on a visit to Reading.  It shows the Maiwand Lion, commemorating the dead of the Berkshire Regiment of Foot at Girishk Maiwand and Kandahar in 1880. The British were defeated at Girishk Maiwand by the Afghan army at a high cost to both sides during the 2nd Afghan war. reading lion

As the astute reader will gather from the the title of this post, it actually rained today but as this didn’t happen until the early evening and as it didn’t last long, it didn’t make much of a dent in our spell of excellent weather.

We had a sunny morning and made the most of it.  I had to pay an early visit to the health centre for a blood test and was happy to find that I still had some but I wasted no time when I got back in getting…

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— vashishtha

#दरवाजे_और_खिड़कियाँ# बागों के पहरेदार से होते दरवाजे ,, और कलियों सी नाजुक होतीं खिड़कियाँ !! कितना भी मन को बहलाएँ कितना भी सुख-दुःख बांटे , दरवाजों सी समझदार कभी बन नही पातीं खिड़कियाँ !! हर मौसम में अविचल रहते दरवाजे ,, इक झोके से सिहर उठती खिड़कियाँ !! ये खुल जाती हैं मौसम में चुपके-चुपके […]

via — vashishtha

#दरवाजे_और_खिड़कियाँ#
बागों के पहरेदार से होते दरवाजे ,,
और कलियों सी नाजुक होतीं खिड़कियाँ !!
कितना भी मन को बहलाएँ
कितना भी सुख-दुःख बांटे ,
दरवाजों सी समझदार
कभी बन नही पातीं खिड़कियाँ !!
हर मौसम में अविचल रहते दरवाजे ,,
इक झोके से सिहर उठती खिड़कियाँ !!
ये खुल जाती हैं मौसम में चुपके-चुपके ,,
पुरवाई में महक उठती खिड़कियाँ !!
बंधन में जकड़े रहते जब दरवाजे,,
किरणों के स्वागत में खुलती खिड़कियाँ !!
रिमझिम फुहारो में लहराता इनका आँचल ,,
बूंदों के संग हौले-हौले थिरकती हैं खिड़कियाँ !!
सबके लिये मुस्काते रहते दरवाजे ,,
तन्हाई में सिसकती हैं खिड़कियाँ !!
जब उतरता है वसंत खिडकियों पर ,,
दिन-दिन भर बतियाती रहतीं खिड़कियाँ !!
ये बतियाती हैं फूलो से तितली से ,,
ये बतियाती हैं चिड़ियों , गिलहरियों से ,,
अरे भले ही मौन साध ले दरवाजे ,,
होती है बातून बड़ी ही खिड़कियाँ !!
जब दुनियाँ से झूंठ बोलते दरवाजे ,,
सारा सच दिखला देती हैं खिड़कियाँ !!
भावशून्य अक्खड़ होते हैं दरवाजे ,,
चंचल ,नटखट भोली-भाली
खिड़कियाँ !!
ऋतु बदले पर मन ना बदलें दरवाजे,,
..और मौसम की हो जाती हैं खिड़कियाँ !!
पल में हो जाती हैं बागों की ,
बहारों की ,,,,
हो जाती हैं चाँदनी रातों की
बरसातों की ,,,,,
गाती ,गुनगुनाती हैं बुलबुलों के साथ-साथ ,,
जुगनुओं सी जगमगाती खिड़कियाँ !!
अजी खिडकियों को होता है
खिडकियों से प्यार ,,
खिडकियों को करते देखा
खिडकियों से तकरार ,,
खिड़कियाँ खनकती है
खिड़कियाँ सिसकती है
और खुल के खिलखिलातीं खिड़कियाँ !!
सीधे सम्भले गम्भीर होते दरवाजे “”
चुलबुली शैतान होती खिड़कियाँ !!
अल्हड़ नादान होती खिड़कियाँ !!

26/3/18
“मीनाक्षी वशिष्ठ “