तुम्हे लिखना ही चाहिए

“तुम्हें लिखना ही चाहिए”

लिखो……….!
अगर उबर आये हो तुम अंधेरो से,
तुम्हे लिखना ही चाहिए
ये फर्ज है तुम्हारा।।
जिससे जान सके दुनिया इतने भी भयावह नही होते अंधेरे,
घुप्प अँधेरों में भी नजर आती है एक राह नए जीवन की।।

लिखो——-!
जिससे बता सको
इस दुनिया को
आप मात्र दर्शक नही थे
शामिल हुए थे इस दुनियां के उत्सव में,
रास,रंग, और ‘प्रेम’ में ।
कि तुमने भी जिया था कभी प्रेम या कुछ-कुछ प्रेम जैसा।।

लिखो——-!
कि बता सको अगली पीढ़ी को दास्ताँ अपने प्रेम पगे उनींदे पलो की।।
बता सको कि…….
अक्खड़ नही हो तुम
तुमने भी महसूस की थी प्रेम की मीठी गुदगुदी।।
कि तुम भी नही रहे अछूते इस प्रेम के संक्रमण से,,
कभी बसन्ती हवा चटकाती थी तुम्हारे भी मन में कलियाँ।
कि तुमने भी देखा था खुली आँखों से परीलोक।।

लिखो……….!
जिससे कि खा न जाये तुम्हे
तुम्हारी ही चुप्पी,,
जैसे खा जाती है दीमक
मौन पड़ी किताबों को,
चुप्पी साधे खड़े दरवाजों को।।
गुमसुम रहने वाले अक्सर मर जाते हैं गुमसुम रहने से,,
लिखो……………!
कि चीख पड़े तुम्हारे अन्दर मौन पड़े शब्द।।
लिखो…………….!
कि मर न जायें तुम्हारे विचार
घुट-घुट कर ,,
इन्हें रास्ता दो बाहर आने का
वरना सड़ जाएँगे
गांव के पुराने कुएं के पानी की तरह,,
लिखो—–!
जिससे कि तुम भूल ही न जाओ लिखना।।
तोड़ो भी ये चुप्पी औऱ लिखो
कि दुनिया के रजिस्टर पर
दर्ज हो तुम्हारे भी
हस्ताक्षर,,

मीनाक्षी वशिष्ठ

चित्र सौजन्य-गूगल

तुम्हे लिखना ही चाहिये

“तुम्हें लिखना ही चाहिए”

लिखो……….!
अगर उबर आये हो तुम अंधेरो से,
तुम्हे लिखना ही चाहिए
ये फर्ज है तुम्हारा।।
जिससे जान सके दुनिया इतने भी भयावह नही होते अंधेरे,
घुप्प अँधेरों में भी नजर आती है एक राह नए जीवन की।।

लिखो——-!
जिससे बता सको
इस दुनिया को
आप मात्र दर्शक नही थे
शामिल हुए थे इस दुनियां के उत्सव में,
रास,रंग, और ‘प्रेम’ में ।
कि तुमने भी जिया था कभी प्रेम या कुछ-कुछ प्रेम जैसा।।

लिखो——-!
कि बता सको अगली पीढ़ी को दास्ताँ अपने प्रेम पगे उनींदे पलो की।।
बता सको कि…….
अक्खड़ नही हो तुम
तुमने भी महसूस की थी प्रेम की मीठी गुदगुदी।।
कि तुम भी नही रहे अछूते इस प्रेम के संक्रमण से,,
कभी बसन्ती हवा चटकाती थी तुम्हारे भी मन में कलियाँ।
कि तुमने भी देखा था खुली आँखों से परीलोक।।

लिखो……….!
जिससे कि खा न जाये तुम्हे
तुम्हारी ही चुप्पी,,
जैसे खा जाती है दीमक
मौन पड़ी किताबों को,
चुप्पी साधे खड़े दरवाजों को।।
गुमसुम रहने वाले अक्सर मर जाते हैं गुमसुम रहने से,,
लिखो……………!
कि चीख पड़े तुम्हारे अन्दर मौन पड़े शब्द।।
लिखो…………….!
कि मर न जायें तुम्हारे विचार
घुट-घुट कर ,,
इन्हें रास्ता दो बाहर आने का
वरना सड़ जाएँगे
गांव के पुराने कुएं के पानी की तरह,,
लिखो—–!
जिससे कि तुम भूल ही न जाओ लिखना।।
तोड़ो भी ये चुप्पी औऱ लिखो
कि दुनिया के रजिस्टर पर
दर्ज हो तुम्हारे भी
हस्ताक्षर,,

मीनाक्षी वशिष्ठ।

चित्र सौजन्य–गूगल

अँजुरी भर प्यार

…हाय मैंने तो अँजुरी भर खुशबू सहेज रखी थी औऱ भ्रम पाल बैठी कि फूल हैं
खुशबू ही तो थी उड़ जाना ही था ,”उड़ गई ” फिर क्या फर्क पड़ता है मुट्ठियाँ खुली हो या भिंची।
…तय तो ये हुआ था नजदीकियां इतनी रहनी हैं कि कोई डायरी पर्सनल न रहे तू पढ़े मेरी सारी छुपी डायरियां औऱ मैं तेरा चेहरा।
धोखा था आँखों का जो बेरंग रिश्ते में हजार रँग देख बैठीं।
वो गुलाब सा सुर्ख दिखता रिश्ता फ़क्क़ सफ़ेद निकला।
अंतहीन सोच थी कहीं भी उलझती रही। बार-बार वही खोजा जो कहीं था ही नही।
जाने बुरी थी मैं या साल ही बुरा था जो चारो ओर मनहूसियत फैल गई औऱ मनों में अँधेरे।
देखते ही देखते जाने कितने ‘अपने’ आँखों से ओझल हो गए कहने के लिये सोची हुई सारी बातें अनकही रह गईं।।
रिश्ते भुरभुरी रेत से हाथों से फिसल गए।
बचे रह गए जो रिश्ते महामारी की चपेट से उनमें भी कहाँ बचा रह पाया जीवन ।
न तो दुनियाँ पहले जैसी रह गई न ही मन।।
जाने बदल गए हैं लोग या नजरिया पर बदल गया है सब कुछ।।
कुछ नामों को चेहरे न मिले कुछ रिश्तों को नाम।।
एक बेनाम रिश्ता चुपके से मन में उतर कर जिद्दी दूब सा फ़ैल गया।
पौध होती स्वार्थ की तो रोप देती उखाड़कर किसी औऱ आँगन
प्रेम का बीज था न जाने कब वटवृक्ष बन बैठा ।
अकेला होना सौभाग्य है खुद से मिलने का” मैं कहती और लम्बा चौड़ा ज्ञान बघारती।
वो कहता राम न करे कभी जानना पड़े तुम्हे क्या होता है लाखो की भीड़ में अकेला होना।
द्वारे से ही राम राम करती रही मन से भरी पूरी जानती भी कैसे ,”क्या होता है किसी का आकर लौट जाना।।
मन पाल बैठा है ऐसी खोखल जो पाटे न पटे।।
बड़ा इठलाकर कहती थी इतनी मजबूत है मेरी पकड़ कोई नही लौट पाया आज तक मेरी दुनियाँ से तुम भी न लौट पाओगे।
यूँ बिन बताये बोरिया बिस्तर समेट लौट गया वो कि उसके लिये लिखी सारी चिट्ठियाँ कुँवारी ही रह गई ।।

वो कहता क्या होगा गर जुदा हो गए रास्ते ,’तुम आगे बढ़ जाना जीवन में बिना ठिठके
मैं उम्र भर ठहरा हुआ निहारूँगा तुम्हारे जाने का रास्ता
पुकार इतनी सच्ची लगी ठहर गई मैं ठहर गया जीवन ठहर गये रास्ते ,नदियाँ ,मौसम
न ठिठके तो बस वो पाँव
जो दम भरते थे उम्र भर ठहर जाने का,

जो कहता था मैं तो पत्थर बन रह जाऊंगा उम्र भर जो अकेले आगे बढ़े तुम ,’तुम्हारी कसम” उसने तो जाते -जाते ये भी न कहा कि फिर-फिर याद आओगे तुम…
मुझे मिले जाने-अजाने सब अच्छे थे बहुत अच्छे ,तुम भी ।।

बस बुरी रही मैं सबसे बुरी तुम्हारे लिये जो अँजुरी भर प्यार भी सम्भाला न गया।

माँ सच-सच बोलो ना

चित्र-प्रतीकात्मक साभार गूगल

माँ ………
“पराये घर” में हूं मैं ,,
या”पराये घर “जाना है ,,
सच-सच बोलो ना ,,!!
माँ मैं तो बिखरी हूँ ..
तेरे घर के कोने-कोने में ,,
कैसे सिमटूंगी ..
ऐसे पल छिन में ,,
मुझे विदा कर भी दो
तो क्या..
अहसासों को कर पाओगी ?
एक झटके में पराया 
कैसे कर पाओगी ??
माँ सच-सच बोलो ना !!
‘तेरा घर पराया’ जानकर भी
प्यार से कोना-कोना सींचा 
ये घर में टँगी पेंटिंग के 
कोने में लिखा मेरा नाम..!
गुलदस्ते में करीने से सजे फूलों में 
मेरी छुअन ….!
मेरी पसंद के रंग से सजी
घर की दीवालें ,,,
चटख रंग के दरवाजे .. !
बालकनी में महकते
मेरे लगाये फूल-पौधे ..!
दरवाजे में बँधा ,,,
मेरा बनाया बँदनवार …!
मेरी पसंद के पर्दे
बेडशीट ,खिलौने …!
सब कर पाओगी दूर 
मेरे साथ-साथ !!
शायद हर दिन फुदकेंगी
ये गिलहरियाँ 
मेरे बाद भी.!
शायद छतों पर यूं ही
उतरा करेंगी,,
पंछियों की कतारें ,,
ज्यों चहकते है मेरे साथ,,
शायद ! बिल्कुल ऐसे ही..!
शायद ! यूं ही …
होते रहेंगे गुलजार
ये मेरे लगाये घोंसले,,,
क्या इनके शोर में ,,,,
मेरी यादों का शोर,,
दवा पाओगी…??
माँ ! सच-सच बोलो ना !!
धर के कोने-कोने में 
बिखरी हूं “मैं” 
और मुझे याद करने की
सौ वजहें , , ,
इक पल में मुझे समेटकर
दूर कैसे कर पाओगी …??
दसकों की यादें ,,,
यूं पल में भुला पाओगी ??
……..माँ …….
मुझे तुम्हारे घर से विदा 
कैसे कर पाओगी ??
माँ सच-सच बोलो ना !!

अंतिम विदा

जीवन चाहे जितना अधूरा रहा हो मेरी अंतिम विदा पूरी हो

मनचाहा जीवन’ तो लाखों ने पाया पर ‘मनचाही मृत्यु’ किसी विरले के ही हिस्से आती है।
करोड़ो में खेलने वाले भी यूँ ही अनमने,अधूरे,अनकहे ,छटपटाते हुए चले जाते है।

जब छोटी थी एक दिन पड़ोस के माली बाबा को मरते देखा।काफ़ी बूढ़े थे वो और बीमार भी,,एक सुबह अपने नाती,बहू से बोले जाओ सारे मुहल्ले को बुला लाओ ,’कहना बाबा जा रहे है आखिरी राम राम करनी है। 2मिनट में सारा मुहल्ला इकट्ठा हो लिया।बाबा ने हाथ जोड़ कर सबसे कहा -“कहा-सुना माफ करना अब जा रहे हैं।कोई कुछ बोलता इससे पहले बहू ने बताया सारी रात बाबा को घबड़ाहट होती रही बार बार इनको उठाते-बैठाते रहें है ,कह रहे थे आज और सेवा कर लो कल तो चले ही जायेंगे…!
बाबा ने माफ़ी माँगी ।सबसे राम राम कहा और बोले अब सब चले जाओ अकेला छोड़ दो।
सब अपने अपने घर लौट आये थोड़ी देर बाद फिर बहू के रोने की आवाज आई “बाबू चले गये”
कुछ पड़ोसी रो रहे थे कुछ हैरान थे,कुछ उनके पुण्यों का लेखा जोखा कर रहे थे।बाबा मर चुके थे।
उनके किये पाप आज नही गिनाए गये ।पुण्य के नाम पर इतना ही निकला कि सारे दिन फूलों की माला पिरोते और सुबह-शाम नियम से पूजा करने वालो के घर पहुंचा देते। यही उनकी जीविका थी।
यही पुण्य था बस खुली आँखों देखा गया।इसके अलावा उनके खाते में कोई कथा,भागवत,दान ,दक्षिणा तो न थी ।
…..7 साल की थी तब मेरे द्वारा देखी गई ये पहली मृत्यु थी लगा शायद ऐसी ही होती होगी हर मृत्यु।इतनी ही ख़ास,, इतनी ही सम्पूर्ण।।
जाने वाले दिन ऐसे ही लेते होंगे लोग विधिवत विदा……
मैं भी ऐसे ही जाऊँगी सबसे सॉरी बोलकर ,सबसे विदा लेकर।।
कहीं भी किसी मन में मेरे लिये जरा भी कड़वाहट न रह जाये ।

लेकिन कुछ दिन बाद अचानक एक दिन स्कूल में पता चला कीर्ति चली गई।वो होमवर्क,क्लासवर्क सब अधूरा ही छोड़ गई।
अरे ऐसे थोड़ी जाते हैं जो बिन बोले अचानक मुझे छोड़कर चली गई ।
बस बुखार ही तो था ऐसे भी कोई जाता है क्या…
उसने कहा था वो हर हाल में लौटेगी।
संडे को उसकी गुड़िया की शादी है और मुझे भी शादी में जाना ही होगा वरना गुड़िया का दिल टूट जायेगा”
झूँठी !!
मैंने कई सालों तक स्कूल में उसकी जगह किसी को न बैठने दिया,,
मैंने जीवन में उसकी जगह किसी को न आने दिया पर वो झूँठी आज तक न लौटी ।कहती थी पक्की से पक्की वाली सहेली है ,हमेसा साथ रहेगी पर जाते समय एक बार भी न सोचा।
गले न मिलना था न मिलती
एक बार प्रॉमिस तोड़ने का सॉरी तो बोल देती।।सॉरी भी नही बोलना था तो न बोलती कम से कम “बाय”‘ तो बोलना ही था।
तब जब कीर्ति दो साल की दोस्ती भूलकर अचानक चली गई मैं फूट फूटकर रोई थी ।
मैं उसके गले लगकर उसकी पीठ पर दो मुक्के मारना चाहती थी पर उसकी मम्मी ने बताया ,”बिटिया वो अब न आएगी उसका स्टेशन आ गया था उसे उतरना ही था हम अभी सफर में है जैसे ही हमारा स्टेशन आएगा हमें भी उतरना ही पड़ेगा।वो ॐ शांति” में थी सो शांत थी पर मै इतनी बेचैन की खाना तो क्या कई दिन तक पानी भी पीने का मन न हुआ।।
तभी मैंने जाना मरना ऐसा भी होता है अधूरा सा…..
सबके हिस्से नही आता आखिरी राम राम करना।।
सम्भलने में समय लगा पर सम्भलना ही था और क्या करती।उसके बाद 8-10 को मरते देखा और हज़ारों-हजार तरीके की हृदय विदारक मृत्यु सुनी और पढ़ी पर कोई मृत्यु फिर से वैसी न देखने को मिली।।
कितने भाग्यवान थे वो जो पाई थी ऐसी शानदार मृत्यु जहाँ हर भूल/हर अपराध की क्षमा माँग सके जाने से पहले।।
जीवन चाहे जैसा जाए पर मृत्यु ऐसी ही आये।।जीवन को लेकर तमाम सपने पाले रखते हैं लोग जीवन ऐसा हो,जीवन वैसा हो जबकि नही मालूम चार पल बाद जीवन रहेगा भी या नहीं मृत्यु जो आनी ही है ,,बिना किसी पूर्व सूचना के उसकी अगवानी की तो कभी कोई व्यवस्था ही नही करता।कौन जाने कौन सा पल आखिरी हो,कितने भारी मन से कितना अधूरा जीवन लिये लौट जाना पड़े……!

देखी /सुनी हजारों हजार मृत्युयों में से यही एक मन में बैठ गई जहाँ एक दिन पहले ही उन्हें मालूम था कि कल जाना है।।
कई बार प्रार्थना में माँगा कि जब भी आख़िरी पल हो मैं और मन दोनों ही जिन्हें अपना कह सकें वो मेरे अपने मेरे पास हो।। यूँ ही अस्त व्यस्त सी, आधे-अधूरे मन से ,यहाँ-वहाँ उलझी सी छटपटाती हुई ही न लौट जाऊँ । कहने वालों से कहने के लिये सोची हुई सारी बातें कह सकूँ। ख़ास लोगों को बता सकूँ कि कितने ख़ास थे वो मेंरे लिये औऱ क्यो ??

जाने -अजाने किये अपराधों की क्षमा माँग सकूँ।
लौटूँ तो विधिवत विदा लेकर लौटूँ।।

मीनाक्षी वशिष्ठ

वो बचपन वाली छुट्टियां नानी औऱ ननिहाल


खुशनशीव होते हैं वो बच्चे
जिनके पास नानी का गांव होता है।।
छुट्टियाँ बिताने को इक प्यारा सा ठाँव होता है।।
हमारे बचपन में भी था
प्यारी नानी का प्यारा सा गाँव
और नानी के गाँव जाने के हजार बहाने,,
नानी का बूढ़ा घर
साल भर राह तकता हमारी,,
छुट्टियों के साथ ही हम जा धमकते नानी के घर”
बाँहे फैलाकर मिलता था हमसे,
बूढ़े घर क़ा सूना आँगन ।।
अधउखड़े खम्बों की झुर्रीदार अंगुलियाँ पकड़
हम सब मिल खेलते चूहा भाग बिल्ली आई।।
सुने घर में गूँजती घरघुली की आवाजें
खो ही जाती थीं हमारे शोरगुल में।।
महीने भर करते हम जी भर शरारतें ।।
जब हमारी शरारतों से पड़ौसी मुँह बिचकाते,,
कानों में अंगुलियाँ डाल
हम थोड़ा और जोर से चिल्लाते,,
आँगन के उदाश कंगूरों के कानों में
भर जाती हमारी धमाचौकड़ी की गूँज,,
जो साल भर गूँजती रहती
मौके बेमौके ।।
हमारी तोतली बातें सुन
मुस्कुरा उठते मौन कंगूरे,,
नानी की बगिया हर शाम सजाती थी
जुगनुओं की झालरें हमारे लिए,,
हर सुबह फूल खिलते ही
आ जातीं ढेर सारी तितलियां
रात के खाने में नानी परोसती 
चटपटी कहानियों के गुच्छे
भर जाते सारे नन्हे पेट
दो-चार कहानी चखते ही,,
हमारी शरारतों पर मुस्कुराती वो बूढ़ी आँखे
बस बात-बेबात बरस पड़तीं।। 
हर शाम झींगुरों के झुनझुनों की ताल पर
मेढक सुनाते थे लोरियाँ
बेहद बेसुरी कर्कश लोरियाँ।।
छुट्टियां खत्म होते ही
घर पहले जैसा उदास हो जाता
हमारे लौटने की राह में बिछ जाती फिर से
वो बूढ़ी उदास आँखे।।
नानी से वापस लौटने जा वादा कर हम आगे बढ़ जाते
टकटकी लगाए वहीं ताकती रह जातीं उनकी लाचार आँखे।।
हम मुड़-मुड़ देखते
फिर-फिर दौड़कर गले लग जाते,,
हर बार कुछ ऐसी ही होती थीं
हमारी गर्मी की छुट्टियाँ।।

और एक दिन……
हाय एक दिन
नानी नही रहीं।।
नही रही नानी के घर जाने की कोई वजह,,
ढह गया नानी का बूढ़ा घर
नानी की राह तकते-तकते,,
सूख गए उनकी बगिया के सारे फूल,,
सारे पेड़ पौधे ।।
फिर कभी नही हुई हमारी गर्मी की छुट्टियाँ,,
खत्म हुए माँ के 
नानी के घर जाने के
सारे बहाने,,
फिर कभी नही आया कोई लिफ़ाफ़ा नानी के गाँव से,,
नही लिखी माँ ने कोई चिठ्ठी नानी के नाम।।
शायद माँ भूल गयी नानी के घर का पता।।
हाय ! एक दिन नानी नहीं रही।।
और माँ भूल गई 
नानी के घर के सारे रास्ते ।।

मीनाक्षी वशिष्ठ”

चित्र सौजन्य-गूगल

हाय ये निगोड़ी धूप कितने रँग है इसके आज देखा।

कमरे के रोशनदान से रिसकर आती धूप जिसमें घुले धूल कण ऐसे लगते है जैसे मानो ” धूप” धूप न हो सोना बरस रहा हो।
सीढ़ियों से फ़िसलती धूप जरा देखो तो टकटकी बाँधकर….
इसे तो बखूबी मन बदलना आता है।
खिड़की से दिखती पेडों पर चमचमाती धूप औऱ एक साधारण सा पाखड़ का पेड़ भी कितना ख़ास दिखने लगता है।
धूप के अलग-अलग स्थान पर बने अलग-अलग आकार भी मन में अलग अलग भाव जगाते हैं 🤔
ये तो आज ही देखा।।

poached egg plantसुनो वसंत ”

पतझड़ से बहुत डरती हूँ मैं

नही चाहती कभी

पतझड़ देखना

चाहती हूँ तुम छा जाओ

मेरे चारो ओर

फ़ैल जाओ मन की जमी पर

जिद्दी दूब की तरह ”

चाहती हूँ मन को जकड़ लें

इन लाल पीले फूलों वाली जिद्दी लताएँ””

मेरे आस पास यूँ ही

लटकते रहे ये फूलों के गुच्छे”

हर फूल पर बैठी हो रंगीली तितलियाँ””

मन का आँगन लबालब रहे वासंती सुगंध से””

मैं फिर सजाऊँ बालों को फूलों से

बचपन की तरह

आँखे बंद कर गुनगुनाऊ

वो प्यारा सा गीत…..

और फिर से उलझ जाएँ

मेरे बालों में

कुछ नन्ही तितलियाँ

 

….मीनाक्षी वशिष्ठ”

What is this wet stuff falling out of the sky?

Tootlepedal's Blog

Today’s guest picture was taken by my sister Susan on a visit to Reading.  It shows the Maiwand Lion, commemorating the dead of the Berkshire Regiment of Foot at Girishk Maiwand and Kandahar in 1880. The British were defeated at Girishk Maiwand by the Afghan army at a high cost to both sides during the 2nd Afghan war. reading lion

As the astute reader will gather from the the title of this post, it actually rained today but as this didn’t happen until the early evening and as it didn’t last long, it didn’t make much of a dent in our spell of excellent weather.

We had a sunny morning and made the most of it.  I had to pay an early visit to the health centre for a blood test and was happy to find that I still had some but I wasted no time when I got back in getting…

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— vashishtha

#दरवाजे_और_खिड़कियाँ# बागों के पहरेदार से होते दरवाजे ,, और कलियों सी नाजुक होतीं खिड़कियाँ !! कितना भी मन को बहलाएँ कितना भी सुख-दुःख बांटे , दरवाजों सी समझदार कभी बन नही पातीं खिड़कियाँ !! हर मौसम में अविचल रहते दरवाजे ,, इक झोके से सिहर उठती खिड़कियाँ !! ये खुल जाती हैं मौसम में चुपके-चुपके […]

via — vashishtha